नेता प्रतिपक्ष ने किया मेघवाल की पुस्तक का विमोचन
बीकानेर संसदीय क्षेत्र से सांसद मेघवाल के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हुआ है। इस अवधि में उनके द्वारा किए गए कार्यो और उपलब्धियों पर 'जनसेवा में अर्जुन राम मेघवाल' शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की गई है।
सुषमा स्वराज ने मेघवाल के प्रयासों की सराहना करते हुए उपस्थित अन्य सांसदों से भी अपने कार्यकालों का ब्योरा अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के समक्ष रखने की बात कही। पुस्तक को 26 शीर्षकों में विभाजित किया गया है। जिसमें परिचय, लोकसभा में उठाए गए प्रमुख मुद्दे, लोकसभा टीवी को दिए साक्षात्कार, आगामी प्राथमिकताएं, सांसद निधि कोष से क्षेत्र में कराए गए विकास का ब्योरा आदि संकलित की गईं हैं। इसके अतिरिक्त सांसद के रूप में पार्टी संगठन के लिए किए गए कार्यो एवं विदेश यात्रा का भी उल्लेख किया गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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नेता, प्रतिपक्ष, ने, किया, मेघवाल, की, पुस्तक, का, विमोचन
दिसंबर 2, 2010 की अन्य खबरें
Meghwal MP from Bikaner constituency of the term is one year. In this period the works and achievements by their "public service Arjun Ram Meghwal titled book is published.
Sushma Swaraj Meghwal appreciate the efforts of other MPs to present details of their tenures to the people of his constituency to speak of. Book is divided into 26 titles. Which introduces the major issues raised in the Lok Sabha, Lok Sabha TV interview, upcoming priorities, MP Development Fund were made in the details that were compiled etc.. In addition to the MPs as the party organization, functions and travel abroad has also been mentioned.
Indo - Asian News Service.
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Leader, Opposition, has done, Meghwal, of, Book, of, release
December 2, 2010 Other News
प्रस्तुतकर्ता navratna mandusiya पर 12:57 AM
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लेबल: Opposition leaders have also released the book Meghwal
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Monday, January 30, 2012
मेघवाल समाज शिक्षित बनो; संगठित रहो; उन्नति करो
मेघवाल समाज शिक्षित बनो; संगठित रहो; उन्नति करो;
महासभा के उद्देश्य :-
1. भारतीय लोकतंत्र की रक्षा एवम भारत के विकास में सहयोग देना तथा मानव समरसता बढाना।
2. समाज में शिक्षा का वातावरण पैदाकर शैक्षिक जाग्रति पैदा करना।
3. समाज में समग्र मार्गदर्शन हेतु अच्छे साहित्य की रचना करना तथा सही मार्गदर्शन हेतु पत्रिका एवं पुस्तकों का प्रकाशन करना।
4. समाज को संगठित करना, आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करना तथा उनके नागरिक, सामाजिक एवं
5. समाज को संगठित करना, आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करना तथा उनके नागरिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अधिकारों के लिये चेतना जाग्रत करना।
6. समाज में शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं खेलकूद आदि कार्यक्रम आयोजित करना।
7. समाज के लिये सामुदायिक भवन, छात्रावास तथा विद्यालयों आदि का निर्माण कर संचालन करना।
8. समाज में नारी उत्थान हेतु नारी शिक्षा एवं महिला अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करना। परित्यक्ता, विधवा, बेसहारा नारियों के विकास के लिये समुचित मार्गदर्शन प्रदान करना।
9. समाज के विकलांग बच्चों के विकास हेतु समुचित कार्य करना।
10. समाज के युवा शिक्षित बेरोजगारों को स्वरोजगार के लिये प्रेरित करना।
11. गरीब मेधावी छात्र/छात्राओं को तलाशना एवं समुचित आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना।
12. विवाह योग्य युवक/युवतियों का परिचय सम्मेलन करवाना।
13. गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले विवाह योग्य युवक/युवतियों को निःशुल्क विवाह के लिये योगदान करना।
14. समाज में व्याप्त बुराईयों, कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को जड़ से समाप्त करने हेतु प्रचार-प्रसार करना।
15. समाज के किसानों को खेती में वैज्ञानिक तकनिकी का प्रशिक्षण दिलाना एवं उन्नत खेती करने के लियें प्रोत्साहित करना।
16. समाज में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों एवं कर्मचारियों को संगठित कर न्याय दिलाना।
प्रस्तुतकर्ता navratna mandusiya पर 3:54 AM
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लेबल: Meghwal Be educated society; stay organized; do progress;
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महासभा के उद्देश्य :-
1. भारतीय लोकतंत्र की रक्षा एवम भारत के विकास में सहयोग देना तथा मानव समरसता बढाना।
2. समाज में शिक्षा का वातावरण पैदाकर शैक्षिक जाग्रति पैदा करना।
3. समाज में समग्र मार्गदर्शन हेतु अच्छे साहित्य की रचना करना तथा सही मार्गदर्शन हेतु पत्रिका एवं पुस्तकों का प्रकाशन करना।
4. समाज को संगठित करना, आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करना तथा उनके नागरिक, सामाजिक एवं
5. समाज को संगठित करना, आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करना तथा उनके नागरिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अधिकारों के लिये चेतना जाग्रत करना।
6. समाज में शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं खेलकूद आदि कार्यक्रम आयोजित करना।
7. समाज के लिये सामुदायिक भवन, छात्रावास तथा विद्यालयों आदि का निर्माण कर संचालन करना।
8. समाज में नारी उत्थान हेतु नारी शिक्षा एवं महिला अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करना। परित्यक्ता, विधवा, बेसहारा नारियों के विकास के लिये समुचित मार्गदर्शन प्रदान करना।
9. समाज के विकलांग बच्चों के विकास हेतु समुचित कार्य करना।
10. समाज के युवा शिक्षित बेरोजगारों को स्वरोजगार के लिये प्रेरित करना।
11. गरीब मेधावी छात्र/छात्राओं को तलाशना एवं समुचित आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना।
12. विवाह योग्य युवक/युवतियों का परिचय सम्मेलन करवाना।
13. गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले विवाह योग्य युवक/युवतियों को निःशुल्क विवाह के लिये योगदान करना।
14. समाज में व्याप्त बुराईयों, कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को जड़ से समाप्त करने हेतु प्रचार-प्रसार करना।
15. समाज के किसानों को खेती में वैज्ञानिक तकनिकी का प्रशिक्षण दिलाना एवं उन्नत खेती करने के लियें प्रोत्साहित करना।
16. समाज में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों एवं कर्मचारियों को संगठित कर न्याय दिलाना।
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प्रमुख लोग meghwal samaj Key people
प्रमुख लोग meghwal samaj
Key people
ASHOKKUMAR BHATTI IS PRESIDENT-REPUBLICAN PARTY OF INDIA.GUJARAT STATE Afkir brother Vaghela 03 times minister of Gujarat, Social Justice Empowerment. The SSA Exact Minister of Social Justice Empowerment O.
Bhagat Ram Mialakie Punjab were the first among all of the SC that the Punjab Civil Services (PCS) has selected the first batch. He magistrate and other administrative positions and HR, IAS and Master of Daulat Ram together Mehoan worked to make the SC include [46].
Ms Suman Bhagat Jammu - Kashmir Government to the level reached in the Health and Medical Education Minister [47].
Bhagat Acunie Red Cloud was the first member of the Punjab Legislative Assembly was elected. He contested on the BJP ticket. [48]
Ms. Sneha Lata Kumar Bhagat, the first woman in Punjab Mehoan directly IAS (Indian Administrative Service) officer became. They then came to light when he Chennai during the All India Civil Services competition won two silver medals in swimming events. [49]
Ms. Vimla Bhagat was the first cloud that has been promoted to IAS. He became president of the Himachal Pradesh Public Service Commission [50].
Freedom fighter Mr. Dhnepat Ray burner Kaalera Acwru Bass was born in a Meghwal
Bhanwar Lal Meghwal education minister of Rajasthan [51].
Surender Alase a well-known journalist and media Mehwar Cell, Bilawal House, Pakistan's media coordinator. Mehwar in Pakistan within the community the most prominent and influential man. They cast Shidyuld Federation of Pakistan's founder president.
Asked Lal Vishwakarma National Awards (1998) and Shram Shri Award (2003) found [52].
Pro. Raj, National Chairman, Bhagat General Assembly [53] in India has worked for the unity of Mehoan. He Punjab, Haryana, Jammu and Kashmir, Rajasthan etc. Bhagat General Assembly established the state units. They create awareness among Mehoan to run social networking.
54.dhodh mla shree pema ram meghwal
55.mla shree pawan dugal(meghwal)
56.bikaner m.p arjun ram meghwal
प्रस्तुतकर्ता navratna mandusiya पर 12:48 AM
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ASHOKKUMAR BHATTI IS PRESIDENT-REPUBLICAN PARTY OF INDIA.GUJARAT STATE Afkir brother Vaghela 03 times minister of Gujarat, Social Justice Empowerment. The SSA Exact Minister of Social Justice Empowerment O.
Bhagat Ram Mialakie Punjab were the first among all of the SC that the Punjab Civil Services (PCS) has selected the first batch. He magistrate and other administrative positions and HR, IAS and Master of Daulat Ram together Mehoan worked to make the SC include [46].
Ms Suman Bhagat Jammu - Kashmir Government to the level reached in the Health and Medical Education Minister [47].
Bhagat Acunie Red Cloud was the first member of the Punjab Legislative Assembly was elected. He contested on the BJP ticket. [48]
Ms. Sneha Lata Kumar Bhagat, the first woman in Punjab Mehoan directly IAS (Indian Administrative Service) officer became. They then came to light when he Chennai during the All India Civil Services competition won two silver medals in swimming events. [49]
Ms. Vimla Bhagat was the first cloud that has been promoted to IAS. He became president of the Himachal Pradesh Public Service Commission [50].
Freedom fighter Mr. Dhnepat Ray burner Kaalera Acwru Bass was born in a Meghwal
Bhanwar Lal Meghwal education minister of Rajasthan [51].
Surender Alase a well-known journalist and media Mehwar Cell, Bilawal House, Pakistan's media coordinator. Mehwar in Pakistan within the community the most prominent and influential man. They cast Shidyuld Federation of Pakistan's founder president.
Asked Lal Vishwakarma National Awards (1998) and Shram Shri Award (2003) found [52].
Pro. Raj, National Chairman, Bhagat General Assembly [53] in India has worked for the unity of Mehoan. He Punjab, Haryana, Jammu and Kashmir, Rajasthan etc. Bhagat General Assembly established the state units. They create awareness among Mehoan to run social networking.
54.dhodh mla shree pema ram meghwal
55.mla shree pawan dugal(meghwal)
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Saturday, January 28, 2012
देसूरी : मेघवाल समाज आयोजित करेगा कोट सोलंकियान में सामूहिक विवाह
देसूरी : मेघवाल समाज आयोजित करेगा कोट सोलंकियान में सामूहिक विवाह
संवाददाता देसूरी ११ जनवरी
मेघवाल समाज ने कोट सोलंकियान में 51 जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित करने का निर्णय लिया हैं। यह आयोजन मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान देसूरी शाखा के तत्वावधान में होगा। इससे पूर्व यह संस्थान मारवाड जंक्शन में सामूहिक विवाह का सफल आयोजन कर चुका हैं।
कोट सोलंकियान स्थित हरचंदवाणी अलख आश्रम में पीर गुलाबदासजी महाराज के सानिध्य,मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान देसूरी शाखा के अध्यक्ष फू साराम माधव की अध्यक्षता एवं केन्द्रीय अध्यक्ष भोपाजी प्रतापराम गोयल के मुख्य आतिथ्य में आयोजित इस बैठक में मेघवाल समाज ने इस सामूहिक विवाह के आयोजन की सहर्ष मंजूरी दी। इसी के साथ इस आयोजन के लिए समाज के भामाषाहों ने तीन लाख की धनराशि की घोषणा की और उपहारों एवं विवाह सामग्री की घोषणा करने की झडी लगा दी।
बैठक में बताया गया कि विवाह पंजीयन के लिए सात हजार की राशि जमा करानी होगी। वर-वधु को बालिग होना आवश्यक हैं और शपथ पत्र पर एक घोषणा पत्र भी प्रस्तुत करना होगा। विवाह समारोह की तिथि व विवाह की तैयारियों के संबध में निर्णय आगामी बैठकों में किया जाएगा। बैठक में जिला परिषद सदस्य प्रमोदपाल सिंह मेघवाल,केन्द्रीय प्रभारी लक्ष्मण बेगड एवं देसूरी ब्लॉक के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में मेघवाल समाज के पंच एवं युवक मौजूद थे। बैठक का संचालन मोहनलाल भाटी ने किया।
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लेबल: मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान
संवाददाता देसूरी ११ जनवरी
मेघवाल समाज ने कोट सोलंकियान में 51 जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित करने का निर्णय लिया हैं। यह आयोजन मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान देसूरी शाखा के तत्वावधान में होगा। इससे पूर्व यह संस्थान मारवाड जंक्शन में सामूहिक विवाह का सफल आयोजन कर चुका हैं।
कोट सोलंकियान स्थित हरचंदवाणी अलख आश्रम में पीर गुलाबदासजी महाराज के सानिध्य,मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान देसूरी शाखा के अध्यक्ष फू साराम माधव की अध्यक्षता एवं केन्द्रीय अध्यक्ष भोपाजी प्रतापराम गोयल के मुख्य आतिथ्य में आयोजित इस बैठक में मेघवाल समाज ने इस सामूहिक विवाह के आयोजन की सहर्ष मंजूरी दी। इसी के साथ इस आयोजन के लिए समाज के भामाषाहों ने तीन लाख की धनराशि की घोषणा की और उपहारों एवं विवाह सामग्री की घोषणा करने की झडी लगा दी।
बैठक में बताया गया कि विवाह पंजीयन के लिए सात हजार की राशि जमा करानी होगी। वर-वधु को बालिग होना आवश्यक हैं और शपथ पत्र पर एक घोषणा पत्र भी प्रस्तुत करना होगा। विवाह समारोह की तिथि व विवाह की तैयारियों के संबध में निर्णय आगामी बैठकों में किया जाएगा। बैठक में जिला परिषद सदस्य प्रमोदपाल सिंह मेघवाल,केन्द्रीय प्रभारी लक्ष्मण बेगड एवं देसूरी ब्लॉक के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में मेघवाल समाज के पंच एवं युवक मौजूद थे। बैठक का संचालन मोहनलाल भाटी ने किया।
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Friday, January 6, 2012
श्रीमती मंजू मेघवाल

रविवार, २० नवम्बर २०११
श्रीमती मंजू मेघवाल
श्रीमती मंजू मेघवाल
पुष्कर (अजमेर) में 20 अप्रैल,1977 को जन्मी श्रीमती मंजू मेघवाल एम.ए. (लोक प्रशासन) तक शिक्षित हैं। इनका विवाह श्री ओमप्रकाश मेघवाल के साथ हुआ तथा आपके दो पुत्र हैं। पेशे से व्यवसायी श्रीमती मेघवाल तेरहवीं राजस्थान विधानसभा के लिए जायल (नागौर) विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुई।
श्रीमती मेघवाल ने बिना राजनितिक पृष्ठ भूमि के उत्तरोतर सफलता हासिल की हैं। वर्ष 2000 में जायल पंचायत समिति में निर्विरोध पंचायत समिति सदस्य चुनी गई। इसी के साथ वे निर्विरोध प्रधान निर्वाचित हुई। प्रधान का कार्यकाल पूर्ण होते ही इन्होंने विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी जताई। लेकिन तब इन्हें टिकिट नहीं दिया गया। इसके बावजूद ये कांग्रेस संगठन के प्रति जुड़ाव रखते हुए महिला कांग्रेस जिलाध्यक्ष के रूप में पार्टी को अपनी सेवाएं देती रही। पिछले विधानसभा चुनाव में इन्हें टिकिट दिया गया। वे विधायक के रूप में निर्विचित हुई। ये राजस्थान विधानसभा की महिला एवं बाल कल्याण समिति तथा अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति की सदस्य रही हैं। दो माह पूर्व ही इन्हें कांग्रेस जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
राज्यपाल श्री शिवराज पाटील ने 16 नवम्बर, 2011 को श्रीमती मेघवाल को राज्यमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई । इन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग दिया गया हैं।
Smt. Manju Devi Meghwal
Party Name: Indian National Congress
Constituency: Jayal (SC),
Opp. Indian Public School,, Bypass Road, Jayal, Nagaur. Rajasthan
Phone No.: 01583-272327
3/1, Vidhayak Nagar (West), Jaipur
Mobile No.: 9413710526, 94133-68125
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1 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक प्रस्तुतकर्ता प्रमोदपाल सिंह मेघवाल
Saturday, December 3, 2011
कोट सोलंकियान में अलखजी पहाड़ी तक सड़क मंजूर
देसूरी। पंचायत समिति क्षेत्र के कोट सोलंकियान ग्राम में पहाड़ी पर स्थित मेघवाल समाज के आराध्य स्थल अलखजी मंदिर तक पहूंचने के लिए पुरानी पुलिस चौकी से सड़क बनेगी। इसके लिए जिला परिषद ने एमजीनरेगा के तहत तेरह लाख की राशी मंजूर की गई हैं।
जिला परिषद सदस्य प्रमोदपाल सिंह मेघवाल ने बताया कि लम्बे समय से मेघवाल समाज इस स्थल पर आवागमन में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए सड़क की मांग कर रहा था। जिसे मंजूर कर जिला प्रमुख खुशवीरसिंह ने इस मांग को पूरा कर दिया हैं। उन्होंने बताया कि इस कार्य में साढ़े दस लाख रूपए सामग्री मद एवं ढ़ाई लाख रूपए श्रम मद में खर्च होगें।
इधर, कोट सोलंकियान में सोमवार को आयोजित मेघवाल समाज की बैठक में इस स्वीकृति पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए इसके लिए मेघवाल समाज ने जिला प्रमुख खुशवीरसिंह का आभार प्रकट किया और इस निर्माण कार्य दिसम्बर माह के दूसरे पखवाड़े में धार्मिक विधि विधान एवं समारोह पूर्वक शुरू कराने का निर्णय लिया। मेघवाल समाज ने कहा कि जिला प्रमुख ने इससे पहले क्षेत्र के ढ़ालोप में रघुनाथपीर आश्रम की ओरण की चारदिवारी निर्माण की स्वीकृति एवं शोभावास में रघुनाथपीर बगेची तक ड़ामर सड़क निर्माण करवा कर मेघवाल समाज के हित में उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
जिला परिषद सदस्य प्रमोदपाल सिंह मेघवाल ने बताया कि लम्बे समय से मेघवाल समाज इस स्थल पर आवागमन में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए सड़क की मांग कर रहा था। जिसे मंजूर कर जिला प्रमुख खुशवीरसिंह ने इस मांग को पूरा कर दिया हैं। उन्होंने बताया कि इस कार्य में साढ़े दस लाख रूपए सामग्री मद एवं ढ़ाई लाख रूपए श्रम मद में खर्च होगें।
इधर, कोट सोलंकियान में सोमवार को आयोजित मेघवाल समाज की बैठक में इस स्वीकृति पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए इसके लिए मेघवाल समाज ने जिला प्रमुख खुशवीरसिंह का आभार प्रकट किया और इस निर्माण कार्य दिसम्बर माह के दूसरे पखवाड़े में धार्मिक विधि विधान एवं समारोह पूर्वक शुरू कराने का निर्णय लिया। मेघवाल समाज ने कहा कि जिला प्रमुख ने इससे पहले क्षेत्र के ढ़ालोप में रघुनाथपीर आश्रम की ओरण की चारदिवारी निर्माण की स्वीकृति एवं शोभावास में रघुनाथपीर बगेची तक ड़ामर सड़क निर्माण करवा कर मेघवाल समाज के हित में उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
मेघवंश: एक सिंहावलोकन
पुस्तक सार
आर्यों एक घुमन्तु कबीला था. वे भी पशुपालन के लिए नए चरागाहों की खोज में घूमते रहते थे. उन्हें भारत के सिंधु घाटी क्षेत्र की विकसित सभ्यता का पता चला. यह कृषि भूमि सम्पदा से भरपूर थी. यहाँ पर राजऋषि मेघऋषि की एक विकसित सभ्यता थी. आर्यों ने भारत के शान्ति-प्रेमी, मूलनिवासी, सिंधु सभ्यता के शासकों को हराकर उन्हें बेघर कर दिया. ‘मेघवंश’ भी टुकड़ों में बँट गया. वे भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पहचाने जाने लगे. उनके साथ सामाजिक अन्याय होने लगे. उनकी स्थिति त्रासदीदायक और शोचनीय हो गई.
सम्पूर्ण सप्तसिन्धु प्रदेश राजऋषि ‘वृत्र’ के अधिकार में था. जिस प्रकार महादेव को आर्य लोग पार्वती के रिश्ते से पहले महासुर (महाअसुर) कहते थे, उसी प्रकार ये ‘वृत्र’ को भी ‘वृत्रासुर’ नाम से पुकारते थे. महाभारत के आदि पर्व में भीष्म ने ‘वृत्र’ को अनेक गुणों, कीर्ति, शौर्य, धार्मिकता और ज्ञान-विज्ञान का स्वामी माना है.
नाग (असुर) मूलत: शिव उपासक बताए गए हैं. लाल प्रद्युम्न सिंह ने ‘नागवंश का इतिहास’ में बताया है कि नागवंशियों को उनकी उत्तम योग्यताओं, गुणवत्ता, व्यवहार व कार्यशैली के कारण देवों का दर्जा दिया गया है. वे वास्तुकला आदि में निपुण थे. नागवंशियों का सम्पूर्ण भारत पर राज्य था. वंशावली बढ़ने से उनके अलग-अलग स्थानीय वंश हुए तथा बाद में अधिकतर ने वैष्णव धर्म अपना लिया एवं शिव को भी वैष्णव धर्म का देवता मान लिया गया.
अनेक विद्वान सुर तथा असुर को एक ही पिता की संतान होने की बात स्वीकार नहीं करते. प्रह्लाद का पिता असुर (अनार्य) वंश का राजा हिरण्यकश्यप सुरों (आर्यों) का सैद्धान्तिक विरोधी था. हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने वैष्णव विचारधारा को अपनाया. उसके वीरोचन का पुत्र राजा महाबली (असुर-अनार्य) वंशावली का शासक था. केरल राज्य में ट्रिक्करा –(Trikkara) उसकी राजधानी थी. राजा महाबली बड़ा धार्मिक राजा था. उसके राज्य में कोई भी ऊँच-नीच नहीं था. अपने दादा प्रह्लाद की भांति वह भी विष्णु का भक्त था. लेकिन उसे अपने पूर्वजों के साथ आर्यों द्वारा किए गए कपट का ज्ञान था. उसने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण सिन्धु क्षेत्र पर अधिकार करके सौ अश्वमेघ यज्ञ किए (सौ लड़ाइयाँ जीतीं). आर्य (सुर) उससे मन ही मन घृणा करते थे. उसी मेघवंशीय असुर महाराजा महाबली के कुल के इन मेघवालों को ‘बलाई’ भी कहा जाता है.
इन्द्र ने छलकपट से मेघऋषि वृत्रासुर की हत्या की. (ऋग्वेद् के अनुसार) इन्द्र चारों ओर से पापों में घिर गया. जिनमें एक ‘ब्रह्म-हत्या’ का भी था. सम्भवत: इसी कारण लोग वृत्र को ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्रह्मा’ का पुत्र समझते हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन् 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर कब्जा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.
कालांतर में भारत की कई प्राचीन वीर और जुझारू राजवंशीय जातियों का इतिहास लोप हो गया. कइयों को कमीण, कारू जातियों में परिणत कर दिया गया. कइयों का अस्तित्व ही समाप्त प्राय: हो गया.
कुछ लोग समझते हैं कि ‘चमार’ शब्द चमड़े का काम करने वाली जातियों से जुड़ा है और उसी से इतनी घृणा पैदा हुई है. आज बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में यह कार्य हो रहा है और सवर्ण लोग भी कर रहे हैं.
कुछ विद्वानों का मत है कि ‘चंवर’ से ‘चमार’ शब्द की उत्पत्ति हुई है. संभवत: ‘चंवर’ शब्द का विकास ‘चार्वाक’ से हुआ है. इसका तात्पर्य कि जो ‘चार्वाक धर्म’ को मानते हैं, वे ‘चंवर’ हैं. यह धर्म वैष्णव धर्म में विश्वास नहीं करता. यह समानता का पाठ पढ़ाता है तथा झूठे आडम्बरों की पोल खोलता है. चंवर, चामुण्डराय, हिरण्यकश्यप, महाबलि, कपिलासुर, जालंधर, विषु, विदुवर्तन आदि भी ‘चार्वाक धर्म’ को मानने वाले शासक हुए हैं.
प्रतिबंधों के कारण चाहे ‘चमार-समाज’ अकेला पड़ गया, फिर भी वह अपनी शासन व्यवस्था के लिए किसी का मोहताज नहीं रहा और न ही किसी को अपने ऊपर हावी होने दिया. इस समाज का अध्ययन एवं सर्वे करने से पता चलता है कि इसने ब्राह्मणों की मनुस्मृति के कानून-विधान की परवाह नहीं की. वह इन अमानवीय विधानों की धज्जियाँ उड़ाता रहा, चाहे उसे कितनी ही मुसीबतों का सामना क्यों न करना पड़ा हो. ब्राह्मण वर्ग ने जैसे ‘सवर्ण समाज’ की रचना की, वैसे ही चमार वर्ग ने भी ‘चमार आत्मनिर्भर समाज’ गठित किया. भक्तिकाल में रूढ़िवादिता पर चोट के कारण एक ओर दलितों में अधिकार चेतना जागृत हुई तो दूसरी ओर उनके व रूढ़िवादियों के बीच जातीय कटुता को बढ़ावा मिला.
‘चमार’ जाति को अत्यंत अस्पृश्य व नीच बनाने का श्रेय हिंदी शब्द-कोषकारों को जाता है. संस्कृत के शब्द-कोष ग्रथों में ‘चमार’ को नीच जाति नहीं कहा गया था. इस देश में झगड़ा केवल आर्य और अनार्य का है. सिंधु निवासी आडंबरों व अंधविश्वासों में भरोसा नहीं करते थे, उन्हें आर्यों ने मारा. बौद्ध धर्म ने जाति-प्रथा को तोड़कर समानता सिखाई तो बौद्धों को मारा गया. शूद्रों द्वारा अपने अधिकारों की माँग किए जाने पर उनको इतना प्रताड़ित किया जाने लगा. विदेशी आक्रमणकारियों को सवर्णों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता रहा. आश्चर्य की बात है कि रूढ़िवादी सवर्ण लोगों द्वारा हिन्दू धर्म में होते हुए भी यहाँ के मूलनिवासियों (शूद्र-दलितों) को अभी तक शूद्र, अछूत, अग्राह्य व अनावश्यक समझा जाता है. वे इन्हें छोड़ना भी नहीं चाहते. क्योंकि ये उनकी आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के मूल स्तम्भ हैं.
अंग्रेजों ने यहाँ फैले अंधविश्वासों और कुप्रथाओं का अंत करना शुरू किया. इससे दलितों को पढ़ने व रोजगार का अवसर मिला, जिससे उनकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. आर्य समाज का जब खूब प्रचार-प्रसार हुआ तो बहुत से लोगों ने ‘आर्य’ लगाकर जाति नाम बदला. आजकल लोगों द्वारा अपने नाम के पीछे ‘भारती’ लगाने का रिवाज़ सा चल पड़ा है. पंजाब में आदिधर्म द्वारा यह प्रचार किया गया कि हम इस देश के आदिनिवासी (मूलनिवासी) हैं. सुधारवादी आन्दोलनों में यह निर्णय लिया गया कि ‘चमार’ शब्द से समाज को पग-पग पर अपमान झेलना पड़ता है, इसलिए ‘चमार’ जैसे अपमानजनक जाति सूचक शब्द से छुटकारा दिलाया जाए.
राजस्थान और गुजरात में स्वामी गोकुलदास जी ‘मेघवंश’ नाम से समाज को एक सूत्र में संगाठित कर रहे थे. इन्होंने समाज को एक नाम देने के लिए सन् 1935 में ‘मेघवंश इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी. इसका संशोधित संस्करण 1960 में प्रकाशित हुआ. राजस्थान और दिल्ली में आचार्य स्वामी गरीबदास जी ने मेघवाल, बलाई, भांबी आदि मूलत: कपड़े बनाने का कार्य करने वाली जाति को ‘सूत्रकार’ नाम से संगठित किया. उन्होंने ‘अखिल भारतीय सूत्रकार महासभा’ का गठन कर समाज को बेगार मुक्त करने का एक पुरजोर आन्दोलन छेड़ दिया. पहले सूत्रकार आन्दोलन से मेघवाल समाज का सामाजिक स्तर बढ़ा.
भारत रत्न बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडर ने सभी दलित जातियों को एक झण्डे के नीचे इकट्ठा होने का आह्वान किया. उन्होंने प्राचीन धर्म ‘बौद्ध धर्म’ को पुनर्जीवित किया. उसे नई शक्ति और नई दिशा दी. उन्होंने भारत की हजारों अस्पृश्य जातियों में बंटे दलितों को मात्र एक ‘अनुसूचित जाति’ में, सैकड़ों जनजातियों को एक ‘अनुसूचित जनजाति’ में तथा अनेक पिछड़ी जातियों को एक ओ.बी.सी. (अन्य पिछड़ी जाति) में संगठित कर दिया.
तीन दशक पहले राजस्थान के हाड़ोती और झालावाड़ जिले में समाज के लोगों ने अपने को केवल ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया और अपने भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिए. झुंझुनू में एक सम्मेलन में शेखावटी, खेतड़ी, झुंझुनू, फतेहपुर आदि के स्वजातीय भाईयों ने घोषणा कर दी कि ‘गर्व से कहो हम मेघवाल- हैं’. यहाँ भी ‘मेघवाल’ जाति के प्रमाण-पत्र बनवाकर भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिए. अलवर जिले में भी मुहिम चली तथा वहाँ भी ‘मेघवाल’ नाम से जाति प्रमाण-पत्र बनवा लिए. हरियाणा की ‘चमार महासभा’ की नारनौल इकाई ने भी अपने को ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया है. कुरुक्षेत्र, रेवाड़ी व दिल्ली में भी ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया है.
रूढ़िवादी हिन्दुओं की घृणा, दमन, शोषण एवं अत्याचारों से बचने के लिए दलित लोग समय-समय पर ‘जाति’ व ‘धर्म’ बदलते रहे हैं. परन्तु रूढ़िवादियों ने इन्हें ‘चमार’ ही कहा. अनगिनत प्रयास किए, पर पुछल्ला लगा ही रहा.
संगठन बल और सत्ताबल से सभी भय खाते हैं. आज जो जाति एकजुट हुई है, वही सफल रही है. अतः आज समय आ गया है कि इस वर्ग की सभी जातियाँ अपनी उपजातियाँ, आपस के वर्ग भेद को मिटाकर पुन: अपने मूल ‘मेघवाल’ नाम को स्वीकारें और अपनी ‘जाति पहचान’ को संगठित, सुदृढ़ और अखण्ड बनाए रखने के लिए अब ‘मेघवाल’ नाम के नीचे एक हो जाएं. मेघवालों में आपस में यदि कोई समाजबंधु विभेद पूछना भी चाहे तो कह सकते हैं, मैं ‘जाटव मेघवाल’ हूँ, मैं ‘बैरवा मेघवाल’ हूँ, मैं ‘बुनकर मेघवाल’ हूँ मैं ‘बलाई मेघवाल’ हूँ, इत्यादि. इसके बाद साल-छ: महीनों में यह विभेद भी समाप्त हो जाएगा. आपसी भेदभाव भुलाकर रोटी-बेटी का व्यवहार शुरू करें. जब अन्य जातियों के लोग मेघवालों के शिक्षित बच्चों के साथ अपने बच्चों की शादी बिना किसी हिचकिचाहट के कर रहे हैं तो हम छोटी-छोटी उपजातियों में भेदभाव नहीं रखें तो अपनी एकता बनी रहेगी. मिथ्या भ्रम व भेदभाव की निद्रा से जागें.
इसके लिए सुझाव है कि ‘विश्व मेघवाल परिषद्’ या ‘अन्तर्राष्ट्रीय मेघवाल परिषद्’ नाम की एक प्रतिनिधि संस्था गाठित की जाए. भारत देश की सभी मेघवंशीय उपजातियाँ छोटे-बड़े का भेद भुलाकर आपसी सहयोग का एक समझौता कर सकती हैं.
हमें सुनिश्चित करना है कि हम केवल नौकरी की तलाश में न रहकर, व्यापार (बिज़नेस) की ओर भी ध्यान दें. यह शाश्वत सत्य है कि जिसने भी समय के साथ स्थान परिवर्तन किया, बाहर जाकर खाने-कमाने की कोशिश की, वे सम्पन्न हो गए. शहरों में जाकर भी धंधा कर सकते हैं. दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं.
नाम बदलने के साथ-साथ हमें सामाजिक बुराईयों से, रूढ़ियों से भी निजात पानी होगी. हम मृत्यु-भोज पर हजारों रुपए खर्च कर डालते हैं, जो पाप है. अनेक देवी-देवताओं के मंदिरों में माथा टेकने से अच्छा है कि घर पर माँ-बाप की सेवा करें.
धर्मभीरूता को त्यागकर नए सवेरे की ओर बढ़ो! आज विज्ञान का युग है. हमने लिए अच्छा है कि हम विज्ञान सम्मत धर्म अपनाएं. गूंगे-बहरे मत बने.
‘Meghvansh: Ek Singhavlokan’
Writer: R.P. Singh
ISBN 81-8033-017-6
Publisher: Ravi Prakashan
C-106 Rama Park, Kankrola Mod
Najafgarh Road, Uttam Nagar
New Delhi-110059
[Courtesy: Mr. Bharat Bhushan Megh - www.meghbhagat.blogspot.com]
आर्यों एक घुमन्तु कबीला था. वे भी पशुपालन के लिए नए चरागाहों की खोज में घूमते रहते थे. उन्हें भारत के सिंधु घाटी क्षेत्र की विकसित सभ्यता का पता चला. यह कृषि भूमि सम्पदा से भरपूर थी. यहाँ पर राजऋषि मेघऋषि की एक विकसित सभ्यता थी. आर्यों ने भारत के शान्ति-प्रेमी, मूलनिवासी, सिंधु सभ्यता के शासकों को हराकर उन्हें बेघर कर दिया. ‘मेघवंश’ भी टुकड़ों में बँट गया. वे भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पहचाने जाने लगे. उनके साथ सामाजिक अन्याय होने लगे. उनकी स्थिति त्रासदीदायक और शोचनीय हो गई.
सम्पूर्ण सप्तसिन्धु प्रदेश राजऋषि ‘वृत्र’ के अधिकार में था. जिस प्रकार महादेव को आर्य लोग पार्वती के रिश्ते से पहले महासुर (महाअसुर) कहते थे, उसी प्रकार ये ‘वृत्र’ को भी ‘वृत्रासुर’ नाम से पुकारते थे. महाभारत के आदि पर्व में भीष्म ने ‘वृत्र’ को अनेक गुणों, कीर्ति, शौर्य, धार्मिकता और ज्ञान-विज्ञान का स्वामी माना है.
नाग (असुर) मूलत: शिव उपासक बताए गए हैं. लाल प्रद्युम्न सिंह ने ‘नागवंश का इतिहास’ में बताया है कि नागवंशियों को उनकी उत्तम योग्यताओं, गुणवत्ता, व्यवहार व कार्यशैली के कारण देवों का दर्जा दिया गया है. वे वास्तुकला आदि में निपुण थे. नागवंशियों का सम्पूर्ण भारत पर राज्य था. वंशावली बढ़ने से उनके अलग-अलग स्थानीय वंश हुए तथा बाद में अधिकतर ने वैष्णव धर्म अपना लिया एवं शिव को भी वैष्णव धर्म का देवता मान लिया गया.
अनेक विद्वान सुर तथा असुर को एक ही पिता की संतान होने की बात स्वीकार नहीं करते. प्रह्लाद का पिता असुर (अनार्य) वंश का राजा हिरण्यकश्यप सुरों (आर्यों) का सैद्धान्तिक विरोधी था. हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने वैष्णव विचारधारा को अपनाया. उसके वीरोचन का पुत्र राजा महाबली (असुर-अनार्य) वंशावली का शासक था. केरल राज्य में ट्रिक्करा –(Trikkara) उसकी राजधानी थी. राजा महाबली बड़ा धार्मिक राजा था. उसके राज्य में कोई भी ऊँच-नीच नहीं था. अपने दादा प्रह्लाद की भांति वह भी विष्णु का भक्त था. लेकिन उसे अपने पूर्वजों के साथ आर्यों द्वारा किए गए कपट का ज्ञान था. उसने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण सिन्धु क्षेत्र पर अधिकार करके सौ अश्वमेघ यज्ञ किए (सौ लड़ाइयाँ जीतीं). आर्य (सुर) उससे मन ही मन घृणा करते थे. उसी मेघवंशीय असुर महाराजा महाबली के कुल के इन मेघवालों को ‘बलाई’ भी कहा जाता है.
इन्द्र ने छलकपट से मेघऋषि वृत्रासुर की हत्या की. (ऋग्वेद् के अनुसार) इन्द्र चारों ओर से पापों में घिर गया. जिनमें एक ‘ब्रह्म-हत्या’ का भी था. सम्भवत: इसी कारण लोग वृत्र को ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्रह्मा’ का पुत्र समझते हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन् 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर कब्जा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.
कालांतर में भारत की कई प्राचीन वीर और जुझारू राजवंशीय जातियों का इतिहास लोप हो गया. कइयों को कमीण, कारू जातियों में परिणत कर दिया गया. कइयों का अस्तित्व ही समाप्त प्राय: हो गया.
कुछ लोग समझते हैं कि ‘चमार’ शब्द चमड़े का काम करने वाली जातियों से जुड़ा है और उसी से इतनी घृणा पैदा हुई है. आज बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में यह कार्य हो रहा है और सवर्ण लोग भी कर रहे हैं.
कुछ विद्वानों का मत है कि ‘चंवर’ से ‘चमार’ शब्द की उत्पत्ति हुई है. संभवत: ‘चंवर’ शब्द का विकास ‘चार्वाक’ से हुआ है. इसका तात्पर्य कि जो ‘चार्वाक धर्म’ को मानते हैं, वे ‘चंवर’ हैं. यह धर्म वैष्णव धर्म में विश्वास नहीं करता. यह समानता का पाठ पढ़ाता है तथा झूठे आडम्बरों की पोल खोलता है. चंवर, चामुण्डराय, हिरण्यकश्यप, महाबलि, कपिलासुर, जालंधर, विषु, विदुवर्तन आदि भी ‘चार्वाक धर्म’ को मानने वाले शासक हुए हैं.
प्रतिबंधों के कारण चाहे ‘चमार-समाज’ अकेला पड़ गया, फिर भी वह अपनी शासन व्यवस्था के लिए किसी का मोहताज नहीं रहा और न ही किसी को अपने ऊपर हावी होने दिया. इस समाज का अध्ययन एवं सर्वे करने से पता चलता है कि इसने ब्राह्मणों की मनुस्मृति के कानून-विधान की परवाह नहीं की. वह इन अमानवीय विधानों की धज्जियाँ उड़ाता रहा, चाहे उसे कितनी ही मुसीबतों का सामना क्यों न करना पड़ा हो. ब्राह्मण वर्ग ने जैसे ‘सवर्ण समाज’ की रचना की, वैसे ही चमार वर्ग ने भी ‘चमार आत्मनिर्भर समाज’ गठित किया. भक्तिकाल में रूढ़िवादिता पर चोट के कारण एक ओर दलितों में अधिकार चेतना जागृत हुई तो दूसरी ओर उनके व रूढ़िवादियों के बीच जातीय कटुता को बढ़ावा मिला.
‘चमार’ जाति को अत्यंत अस्पृश्य व नीच बनाने का श्रेय हिंदी शब्द-कोषकारों को जाता है. संस्कृत के शब्द-कोष ग्रथों में ‘चमार’ को नीच जाति नहीं कहा गया था. इस देश में झगड़ा केवल आर्य और अनार्य का है. सिंधु निवासी आडंबरों व अंधविश्वासों में भरोसा नहीं करते थे, उन्हें आर्यों ने मारा. बौद्ध धर्म ने जाति-प्रथा को तोड़कर समानता सिखाई तो बौद्धों को मारा गया. शूद्रों द्वारा अपने अधिकारों की माँग किए जाने पर उनको इतना प्रताड़ित किया जाने लगा. विदेशी आक्रमणकारियों को सवर्णों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता रहा. आश्चर्य की बात है कि रूढ़िवादी सवर्ण लोगों द्वारा हिन्दू धर्म में होते हुए भी यहाँ के मूलनिवासियों (शूद्र-दलितों) को अभी तक शूद्र, अछूत, अग्राह्य व अनावश्यक समझा जाता है. वे इन्हें छोड़ना भी नहीं चाहते. क्योंकि ये उनकी आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के मूल स्तम्भ हैं.
अंग्रेजों ने यहाँ फैले अंधविश्वासों और कुप्रथाओं का अंत करना शुरू किया. इससे दलितों को पढ़ने व रोजगार का अवसर मिला, जिससे उनकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. आर्य समाज का जब खूब प्रचार-प्रसार हुआ तो बहुत से लोगों ने ‘आर्य’ लगाकर जाति नाम बदला. आजकल लोगों द्वारा अपने नाम के पीछे ‘भारती’ लगाने का रिवाज़ सा चल पड़ा है. पंजाब में आदिधर्म द्वारा यह प्रचार किया गया कि हम इस देश के आदिनिवासी (मूलनिवासी) हैं. सुधारवादी आन्दोलनों में यह निर्णय लिया गया कि ‘चमार’ शब्द से समाज को पग-पग पर अपमान झेलना पड़ता है, इसलिए ‘चमार’ जैसे अपमानजनक जाति सूचक शब्द से छुटकारा दिलाया जाए.
राजस्थान और गुजरात में स्वामी गोकुलदास जी ‘मेघवंश’ नाम से समाज को एक सूत्र में संगाठित कर रहे थे. इन्होंने समाज को एक नाम देने के लिए सन् 1935 में ‘मेघवंश इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी. इसका संशोधित संस्करण 1960 में प्रकाशित हुआ. राजस्थान और दिल्ली में आचार्य स्वामी गरीबदास जी ने मेघवाल, बलाई, भांबी आदि मूलत: कपड़े बनाने का कार्य करने वाली जाति को ‘सूत्रकार’ नाम से संगठित किया. उन्होंने ‘अखिल भारतीय सूत्रकार महासभा’ का गठन कर समाज को बेगार मुक्त करने का एक पुरजोर आन्दोलन छेड़ दिया. पहले सूत्रकार आन्दोलन से मेघवाल समाज का सामाजिक स्तर बढ़ा.
भारत रत्न बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडर ने सभी दलित जातियों को एक झण्डे के नीचे इकट्ठा होने का आह्वान किया. उन्होंने प्राचीन धर्म ‘बौद्ध धर्म’ को पुनर्जीवित किया. उसे नई शक्ति और नई दिशा दी. उन्होंने भारत की हजारों अस्पृश्य जातियों में बंटे दलितों को मात्र एक ‘अनुसूचित जाति’ में, सैकड़ों जनजातियों को एक ‘अनुसूचित जनजाति’ में तथा अनेक पिछड़ी जातियों को एक ओ.बी.सी. (अन्य पिछड़ी जाति) में संगठित कर दिया.
तीन दशक पहले राजस्थान के हाड़ोती और झालावाड़ जिले में समाज के लोगों ने अपने को केवल ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया और अपने भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिए. झुंझुनू में एक सम्मेलन में शेखावटी, खेतड़ी, झुंझुनू, फतेहपुर आदि के स्वजातीय भाईयों ने घोषणा कर दी कि ‘गर्व से कहो हम मेघवाल- हैं’. यहाँ भी ‘मेघवाल’ जाति के प्रमाण-पत्र बनवाकर भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिए. अलवर जिले में भी मुहिम चली तथा वहाँ भी ‘मेघवाल’ नाम से जाति प्रमाण-पत्र बनवा लिए. हरियाणा की ‘चमार महासभा’ की नारनौल इकाई ने भी अपने को ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया है. कुरुक्षेत्र, रेवाड़ी व दिल्ली में भी ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया है.
रूढ़िवादी हिन्दुओं की घृणा, दमन, शोषण एवं अत्याचारों से बचने के लिए दलित लोग समय-समय पर ‘जाति’ व ‘धर्म’ बदलते रहे हैं. परन्तु रूढ़िवादियों ने इन्हें ‘चमार’ ही कहा. अनगिनत प्रयास किए, पर पुछल्ला लगा ही रहा.
संगठन बल और सत्ताबल से सभी भय खाते हैं. आज जो जाति एकजुट हुई है, वही सफल रही है. अतः आज समय आ गया है कि इस वर्ग की सभी जातियाँ अपनी उपजातियाँ, आपस के वर्ग भेद को मिटाकर पुन: अपने मूल ‘मेघवाल’ नाम को स्वीकारें और अपनी ‘जाति पहचान’ को संगठित, सुदृढ़ और अखण्ड बनाए रखने के लिए अब ‘मेघवाल’ नाम के नीचे एक हो जाएं. मेघवालों में आपस में यदि कोई समाजबंधु विभेद पूछना भी चाहे तो कह सकते हैं, मैं ‘जाटव मेघवाल’ हूँ, मैं ‘बैरवा मेघवाल’ हूँ, मैं ‘बुनकर मेघवाल’ हूँ मैं ‘बलाई मेघवाल’ हूँ, इत्यादि. इसके बाद साल-छ: महीनों में यह विभेद भी समाप्त हो जाएगा. आपसी भेदभाव भुलाकर रोटी-बेटी का व्यवहार शुरू करें. जब अन्य जातियों के लोग मेघवालों के शिक्षित बच्चों के साथ अपने बच्चों की शादी बिना किसी हिचकिचाहट के कर रहे हैं तो हम छोटी-छोटी उपजातियों में भेदभाव नहीं रखें तो अपनी एकता बनी रहेगी. मिथ्या भ्रम व भेदभाव की निद्रा से जागें.
इसके लिए सुझाव है कि ‘विश्व मेघवाल परिषद्’ या ‘अन्तर्राष्ट्रीय मेघवाल परिषद्’ नाम की एक प्रतिनिधि संस्था गाठित की जाए. भारत देश की सभी मेघवंशीय उपजातियाँ छोटे-बड़े का भेद भुलाकर आपसी सहयोग का एक समझौता कर सकती हैं.
हमें सुनिश्चित करना है कि हम केवल नौकरी की तलाश में न रहकर, व्यापार (बिज़नेस) की ओर भी ध्यान दें. यह शाश्वत सत्य है कि जिसने भी समय के साथ स्थान परिवर्तन किया, बाहर जाकर खाने-कमाने की कोशिश की, वे सम्पन्न हो गए. शहरों में जाकर भी धंधा कर सकते हैं. दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं.
नाम बदलने के साथ-साथ हमें सामाजिक बुराईयों से, रूढ़ियों से भी निजात पानी होगी. हम मृत्यु-भोज पर हजारों रुपए खर्च कर डालते हैं, जो पाप है. अनेक देवी-देवताओं के मंदिरों में माथा टेकने से अच्छा है कि घर पर माँ-बाप की सेवा करें.
धर्मभीरूता को त्यागकर नए सवेरे की ओर बढ़ो! आज विज्ञान का युग है. हमने लिए अच्छा है कि हम विज्ञान सम्मत धर्म अपनाएं. गूंगे-बहरे मत बने.
‘Meghvansh: Ek Singhavlokan’
Writer: R.P. Singh
ISBN 81-8033-017-6
Publisher: Ravi Prakashan
C-106 Rama Park, Kankrola Mod
Najafgarh Road, Uttam Nagar
New Delhi-110059
[Courtesy: Mr. Bharat Bhushan Megh - www.meghbhagat.blogspot.com]
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